Wednesday, September 8, 2010

दीमकों का दंश झेलता गाँव

आज हम आपको एक ऐसे गाँव से परिचित कराएँगे जो दशकों से दीमक की मार झेल रहा है. यह गाँव अल्मोड़ा जिले के अंतिम कोने में स्थित है. इस गाँव का नाम है लम्बाडी, इस गाँव में दीमक का कहर इस कदर है क़ि गाँव के अधिकांश मकान इन दीमकों की चपेट में आने से गिरने की कगार पर है. हर साल बरसात में इन दीमकों का कहर बढ़ जाता है. जिससे ग्रामीण सांसत में हैं. आलम यह क़ि इन दीमकों पर दवाओं का भी कोई असर होता नही दिख रहा है. इन दीमकों पर पंतनगर के वैज्ञानिक भी अपनी सारी कोशिशे कर कर के थक चुके हैं. लेकिन दीमक से छुटकारा नहीं मिल सका. ग्रामीण इन दीमकों से छुटकारा दिलाये जाने क़ि मांग कर कर के थक गए हैं. अपने उजड़ते आशियानों को देख कर वह कई बार वह सरकार से भी गुहार लगा चुके हैं. लेकिन सरकार से भी उन्हें कोई इमदाद नहीं मिली.


             अल्मोड़ा जिले के स्याल्दे विकास खंड में बसा यह गाँव समुद्र की सतह से १३०० मीटर की ऊँचाई पर स्थित है. करीब तीस साल पहले अचानक इस गाँव में दीमकों का प्रवेश शुरू हुआ. ग्रामीणों की अनदेखी ने इसकी संख्या को बढ़ावा ही दिया. आज यह गाँव में घरो की खिड़की दरवाजे तक ही सीमित नहीं है. बल्कि इन्होने तो ग्रामीणों की फसल और अनाज तक को नहीं छोड़ा है.  दीमकों ने गाँव के कई घरो को खंडहर में तब्दील कर दिया है. जिसके बाद गाँव से पलायन भी शुरू हो गया है. गाँव के करीब पांच परिवार पलायन कर चुके हैं. गाँव के ४० में से ३८ परिवार बीपीएल श्रेणी के हैं. दीमकों से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने नागपुर से केले व क्लोरोगार्ड दवाईयां मंगाकर वितरित की थी. मगर उनका असर भी दीमकों पर नहीं हुआ.जनवरी २००९ में वैज्ञानिकों का एक दल गाँव में आया था. उनकी सर्वे में यह बात निकल कर आई क़ि गाँव में बने मकानों में दीमक का प्रकोप सबसे ज्यादा है. वहीँ खेती में ७५ प्रतिशत और गाँव से सटे जंगल में ४० प्रतिशत दीमकों का प्रकोप दिखायी दिया. जिसके बाद वैज्ञानिकों ने ग्रामीणों को दवाईयां वितरित की थी. जिसका प्रभाव ना होता देख १६-१७ जुलाई २०१० को वैज्ञानिकों के दल ने गाँव में बने ४० मकानों व ३९ गौशालाओं में कीटनाशकों का छिडकाव किया था. २ ग्रामीणों को छिडकाव का तरीका भी बताते हुए दवाएं भी वितरित की. इस छिडकाव से ग्रामीणों को कुछ रहत भी मिली थी. लेकिन बढ़ती बरसात से दीमकों की बढ़ती तादाद ने फिर ग्रामीणों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है. दवा का कोई असर इन पर होता नहीं दीख रहा है. गाँव में बने १५ मकान ढहने की कगार में पहुँच गए हैं. ग्रामीणों ने अपनी आर्थिक स्थिति बताते हुए विधायक से मकान बनाने के लिए मदद की मांग की. लेकिन दो साल बीत जाने के बाद दो परिवारों के लिए इंदिरा आवास मंजूर हुए हैं. ग्राम प्रधान पदम् सिंह का कहना है क़ि वैज्ञानिकों की छिडकाव से असर होता नहीं दिख रहा है. घरो और खेतों में फिर से दीमक दिखाई देने लगी है. वहीँ पंतनगर विश्विद्यालय के कुलपति डॉ बी एस बिष्ट का कहना है क़ि दीमकों का समूल नाश नहीं किया जा सकता. पर इन पर नियंत्रण जरूर पाया जा सकता है. इतने लम्बे समय से आतंक मचा रहे दीमकों पर तुरंत काबू नहीं पाया जा सकता. वैज्ञानिक इस पर काबू पाने के लिए दवा बदल-बदल कर छिडकाव कर रहे हैं. वैज्ञानिक पहले घरों पर लगे दीमक को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं. उनका मानना हैं की दशकों पहले मकानों को भी दुबारा बनाने की जरूरत है.
                                     लेखक, चन्दन  बंगारी, रामनगर के युवा पत्रकार हैं.

1 comment:

  1. editor sahab \ ye corbett park ka kaun sa gaon hai. nai jankari pathako tak pahuchane ke liye thanks.

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